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को-रिएक्टर की स्थापना से होगा मोरबी की सेरेनिक फैक्ट्रियों की समस्याओं का अंत

Updated: Apr 23, 2020


नारी तुझे सलाम, वीमेन ऑफ़ दी फ्यूचर, नाम करेगी रोशन, द रियल हीरो, लोकमत, नारी गौरव, इत्यादि सम्मान प्राप्त एवं भारत की परमाणु सहेली निक नेम से जानी जाने वाली डॉ. नीलम गोयल ने मोरबी में एक प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया। इस प्रेस कांफ्रेंस में परमाणु सहेली ने स्पष्ट रूप में देश की समस्याओं व योजनाओं के सामने चुनौतियों एवं इनके समाधान के सन्दर्भ में विस्तृत रूप में वार्तालाप की।

मोरबी की सेरेनिक फैक्ट्रीयों के लिए तापीय उष्मा ऊर्जा व बिजली की समुचित रूप में पूर्ती हेतु एक स्थाई समाधान के बारें में बताया।

परमाणु सहेली ने बताया कि, भारत देश 1985 में ही ऐसे नाभिकीय संयंत्र की स्थापना कर सकने में सक्षम हो चुका था, जो ऊर्जा के क्षेत्र में चार तरह की आवश्यकताओं की पूर्ती कर सकने में समर्थ है। पहली, विद्द्युत ऊर्जा; दूसरी, तापीय ऊर्जा; तीसरी, मोटर वाहनों के लिए आवश्यक ईंधन व चौथी- खारे या फ्लोराईड युक्त पानी का शुद्धिकरण। इस प्रकार के परमाणु संयंत्र या नाभिकीय संयंत्र "को-रिएक्टर" के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2012 में एक 500 मेगावाट का पीएफ़बीआर टाईप का को-रिएक्टर मद्रास कलपक्कम में कमीशंड भी हुआ। वर्ष 2018 में 10 मेगावाट का "को-रिएक्टर" संचालित भी हुआ है। वर्तमान में भारत अपने देश में 10 मेगावाट से लेकर आवश्यकतानुसार 500 मेगावाट तक के ऐसे संयंत्र लगाने में पूरी तरह से तैयार है। इन संयंत्रों की सबसे ख़ास बात यह है कि इनमें एक बार फ्यूल डालने के बाद ये थोरियम के साथ मिल कर स्वयं से स्वयं के लिए फ्यूल बनाने की सक्षमता रखते हैं। भारत के पास थोरियम का इतना भण्डार है कि भारत अपनी चार प्रकार की आवश्यक ऊर्जाओं की पूर्ती ऐसे ही को-रिएक्टर्स से करने लगे तो भी 6000 वर्षों तक इनके लिए आवश्यक फ्यूल "थोरियम" खत्म नहीं होगा। दूसरी ख़ास बात यह है कि, ये रिएक्टर्स ग्रीन एनर्जी एवं अक्षय पात्र की परिभाषा को पूरी तरह से सिद्ध करते हैं। प्राणी व वनस्पति जगत के लिए स्वच्छ व सुरक्षित है।

मोरबी के लिए सालाना आवश्यक तापीय उष्मा ऊर्जा व विद्द्युत ऊर्जा की गणना के आधार पर 10 मेगावाट से लेकर 500 मेगावाट का एक क-रिएक्टर स्थापित किया जा सकता है। परमाणु सहेली ने बताया कि ऐसी सक्षमता और आवश्यकता चायना देश में होती तो वह चायना में इस प्रकार का परमाणु संयंत्र २ वर्ष के समयांतराल में स्थापित कर लेता। लेकिन भारत में परमाणु संयंत्र की स्थापना की घोषणा से पहले ही वह साईट मरने-मारने के विरोधों में फंस कर रह जाती है। परमाणु सहेली ने बताया कि भारत की जापान के साथ इस क्षेत्र में संधि भी हो रखी है और इस प्रकार के परमाणु संयंत्रों की स्थापना हेतु गैस व तेल क्षत्र में भारत की एक प्रमुख बड़ी कंपनी के साथ बातचीत भी हुई है, लेकिन भारत में परमाणु संयंत्रों की स्थापना में क्षेत्रीय जनता का सकारात्मक समर्थन न होने की वजह से इस कंपनी ने अपने हाथ पीछे खींच रखे हैं। योजनाएं मृत हैं।

परमाणु सहेली ने बताया कि भारत 84 राजनैतिक पार्टियों व संगठनों वाला प्रजातांत्रिक देश है। सभी पार्टियों के मुद्दे व सिद्धांत अलग-अलग हैं। लिहाजा भारत की बड़ी-बड़ी महत्वपूर्ण योजनाएं इन्ही मुद्दों-सिद्धांतों में फंस कर रह जाती हैं।

हरियाणा, बांसवाड़ा, तमिलनाडु में किये गए कार्यों की सफलताओं के बाद परमाणु सहेली का यह दृढ निश्चय हो चुका है कि यदि क्षत्रीय जनता जागरूक होती है और योजनाओं को ठीक से समझ लेती है तो सारी भ्रांतियां खत्म हो जाती है। यही जागरूक जनता फिर उसी योजना को क्रियान्वित भी करा देती है।

परमाणु सहेली ने बताया कि मोरबी में इस प्रकार के संयंत्र की सफलतापूर्वक स्थापना हेतु पहले वे यहाँ के तमाम कारोबारियों के साथ एक सेमीनार कर उन्हें जागरूक करेंगी और फिर यहां की क्षेत्रीय जनता को जागरूक करेंगी। इस प्रकार जो सकारात्मकता का वातावरण कायम होगा तो सम्बंधित सरकार व कंपनी को इस प्रकार का परमाणु संयंत्र स्थापित करने का मार्ग खुल जाएगा।

परमाणु सहेली वर्तमान में पानी, ऊर्जा व कृषि से सम्बंधित राष्ट्रीय व राज्यीय योजनाओं की स्थापना हेतु क्षेत्रीय जनता और ख़ास जनता में सकारात्मकता का वातावरण बनाने का कार्य कर रही हैं। हरियाणा, तमिलनाडु, बांसवाड़ा (राजस्थान में अभी तक के इनके किये गए कार्यों से 5 लाख लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर उत्कृष्ट रोजगार मिले हैं और देश के सालाना विकास में 5000 अरब रूपये के बराबर की सतत बढ़ोतरी हुई है।

इससे पहले परमाणु सहेली गुजरात के ही भावनगर जिले की 6600 मेगावाट के परमाणु संयंत्र पर विरोध की स्थितियों को दूर कर सकने में सफल हुई है। अन्यथा, क्षेत्रीय जनता के मरने-मारने के के विरोधों के चलते हुए वर्ष 2015 में मीठीवर्दी का 6600 मेगावाट का परमाणु संयंत्र आँध्रप्रदेश में विस्थापित करने के आदेश हो चुके थे। परमाणु सहेली का कहना है कि, मीठी विर्दी के परमाणु संयंत्र की स्थापना से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर कई हजार लोगों को रोजगार तो मिलेगा ही, साथ में सस्ते दामों पर बिजली की भी प्राप्ति होगी। इससे सालाना विकास में 5000 अरब रूपये के बराबर की बढ़ोतरी भी संभव हो सकेगी।

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