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मोरबी की आवश्यक विद्द्युत व तापीय ऊष्मा ऊर्जा का बेहत्तर विकल्प है 1000 मेगावाट के परमाणु बिजलीघर

Updated: Apr 23, 2020


न्यूज सर्विस। मोरबी । दिनांक 25 जुलाई 2019


मोरबी के लॉयंस क्ल्ब के महोत्सव में परमाणु सहेली, डॉ. नीलम गोयल ने बताया कि, भारत में कुल 23 परमाणु बिजलीघर कार्यरत हैं और जन सामान्य से अभी तक एक भी जन इन परमाणु बिजलीघरों की वजह से हताहत नहीं हुआ है। दूसरी ऐसी कोई इंडस्ट्री नहीं है जहाँ जन व माल की हानि न हुई हो। सड़क, रेल और हवाई यातायात में तो आये दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं। लेकिन कभी यह आवाज नहीं आती कि इन सुविधाओं को खत्म कर दिया जाय। किन्तु परमाणु बिजलीघर जोकि पूरी तरह स्वच्छ एवं सुरक्षित है और इनसे बनने वाली बिजली देश की नींव को सुदृढ़ करती है, उके विरूद्ध मरने-मारने के विरोध आते हैं। आज भारत में 63,000 मेगावाट परमाणु बिजलीघर की साईट्स निर्धारित हो चुकी हैं, लेकिन परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम एवं परमाणु बिजलीघरों के प्रति अज्ञानताओं की वजह से ये सभी साईट्स मृत प्रायः हैं। 1000 मेगावाट का परमाणु बिजलीघर किसी भी कारण से एक वर्ष भी डिले होता है तो इससे, सालाना, 550 अरब रूपये से लेकर 5500 अरब रूपये के बराबर का समग्र विकास रुका रहता है। यदि अवरोध न होते, अज्ञानता नहीं होती तो आज भारत परमाणु ऊर्जा से ही पर-कैपिटा, सालाना, 3000 यूनिट बिजली का उत्पादन कर रहा रहा होता, जोकि वर्तमान में मात्र 35 यूनिट पर कैपिटा मात्र है । भारत के हर तीसरे गाँव के मध्य एक थोरियम परमाणु बिजलीघर लग रहा होता। परमाणु सहेली ने बताया कि, भविष्य में लगने वाले ये थोरियम पावर प्लांट्स किसी आकर्षक मॉल से कम नहीं होंगे। ये किसी भी भीड़-भाड़ वाले क्षेत्र में भी लगाए जा सकेंगे। इनसे किसी भी प्रकार का कोई खतरा नहीं होगा। लेकिन यह भी तब ही संभव हो पायेगा जब, भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम से अज्ञानता के बादल छंट जाएंगे। परमाणु सहेली ने बताया कि भारत एक लोकतंत्र देश है और इस लोकतंत्र देश में किसी भी ऐसी योजना को सफलतापूर्वक क्रियान्वित करने के लिए इसमें बसने वाली जनता का नैतिक समर्थन आवश्यक होता है।

डॉक्टर नीलम गोयल जिनको भारत की परमाणु सहेली के नाम से भी जाना जाता है, वर्तमान में मोरबी व आस-पास के क्षेत्रों में जन-जागरूकता के कार्यों में संलग्न। नीलम गोयल का कहना है कि, मोरबी व इसके आस-पास के सेरेमिक टाईल्स व वाच इत्यादि के कारोबार के लिए आवश्यक बिजली व उष्मा ऊर्जा की पूर्ति 1000 मेगावाट के परमाणु बिजलीघर की स्थापना से पूरी की जा सकेगी। यह बिजली साफ़, सुरक्षित, सतत व विश्वसनीय तो होगी ही साथ ही व्यापारिक दृष्टि से सस्ती भी होगी। नीलम गोयल ने बताया कि आज भारत की प्रतिव्यक्ति औसत बिजली उपभोग क्षमता व आय की यदि चायना व विकसित देशों से तुलना करें तो, भारत बहुत पीछे है।

भारत की वर्तमान में प्रतिव्यक्ति सालाना औसत बिजली उपभोग क्षमता व आय, क्रमशः, 865 यूनिट व 86500 रूपये है। वहीं, चायना की ये 5000 यूनिट व 7 लाख रूपये है। फ्रांस, जापान, जर्मनी, रसिया, ब्रिटेन की पर कैपिटा बिजली उत्पादन क्षमता तकरीबन 7000 से 8000 यूनिट व पर कैपिटा 12 लाख रूपये से 18 लाख रूपये तक है। अमेरिका का पर कैपिटा बिजली उत्पादन 13,000 यूनिट व पर कैपिटा आय 30 लाख रूपये तक है।

परमाणु सहेली ने बताया कि, भारत के पास विश्व के किसी भी अन्य देश की अपेक्षाकृत गुणात्मक रूप से ज्यादा प्राकृतिक सम्पदा है। भारत के पास उत्कृष्ट कोटि के अर्थशास्त्री, शासक, प्रशासक, वैज्ञानिक, विचारक, योजनाकार, उद्द्योगपति, प्रबंधक, न्यायाधीश, इंजीनियर, अधिकारी, कर्मचारी, कार्यदक्ष व कामगार भी हैं। और भारत की अपने व्यापार मित्र देशों के साथ सकारात्मकता की परिस्थितियाँ भी हैं। पूरे विश्व में भारत की संस्कृति भी सर्वोच्च कोटि की रही है। भारत की जनता की जींस क्वालिटी भी सर्वोत्कृष्ट है। भारत का लोकतंत्र सर्वोच्च कोटि का है।

लेकिन, अपने ही चहुँमुखी विकास की महत्वपूर्ण महत्वाकांक्षी योजनाओं के प्रति आम से लेकर खास जनता भ्रांतियों एवम पूर्वाग्रहों से ग्रसित है। इस अज्ञानी जनता के कंधे पर बन्दूक रख कर तथाकथित खैरख्वाह, क्षेत्रीय व राष्ट्रीय तथाकथित समाजसेवी व जनप्रतिनिधि इत्यादि, अपना-अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। यह जनता और शासक तो इधर-उधर के कभी भी खत्म न होने वाले फसादों (जैसे- हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद, बेरोजगारी, आरक्षण, भ्रष्टाचार, स्विस बैंको में जमा काला धन, रूस-अमेरिका-जापान-चीन-पाकिस्तान, जिन्दाबाद-मुर्दाबाद), इत्यादि, में फंस कर रह जाती रही है। भारत की 85 प्रतिशत जनता को भ्रांतियों एवम पूर्वाग्रहों रूपी एक महादैत्य भ्रान्त्यासुर ने अपने विशाल बाहुपाश में जकड रखा है।

भारत की महत्वपूर्ण योजनाओं का यदि समयान्तर्गत सफलतापूर्वक क्रियान्वयन हो रहा होता तो आज भारत की सालाना प्रति व्यक्ति औसत आय 15 लाख रूपये तक हो चुकी होती। भारत की 68 प्रतिशत जनता जो ग्रामीण देहातों में बसती है, और जिसकी वर्तमान में सालाना औसत आय मात्र 12,000 रूपये है, की भी यह आय 12 लाख रूपये तक पहुँच रही होती।

और इन सबकी जड़ अज्ञानता ही है। इनकी वजह से भारत में इन योजनाओं के क्रियान्वयन की गति कछुए से भी धीमी गति की है और कुछ योजनाएं तो मृत प्रायः है।


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